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कुलभूषण जाधव को न्याय

भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव के मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में सुनवाई के दौरान भारत की दलीलों के सामने पाकिस्तान पूरी तरह बेनकाब हो गया। भारत की ओर से जाधव का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कोर्ट से अपील की कि पाकिस्तान जाधव को हर तरह की कानूनी सहायता और अधिकार मुहैया कराए और उनकी फांसी की सजा पर तत्काल रोक लगाई जाए। साल्वे ने अपनी दलीलों से पाकिस्तान की अमानवीय करतूतों को उजागर करते हुए कहा कि बिना किसी ठोस सबूत और बिना किसी आरोप के किसी भी देशी या विदेशी नागरिक की जान लेना मानवाधिकार की परिधि में आता है। वियना संधि के अनुच्छेद 36 सभी विदेशी नागरिकों को राजनयिक पहुंच और कानूनी मदद सुनिश्चित करता है। लेकिन जाधव के मामले में इस संधि की उचित प्रक्रियाओं का पालन किए बगैर जाधव को पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने फांसी की सजा सुनाई है। इस तरह पाकिस्तान ने वियना संधि का सीधा उल्लंघन किया है। दरअसल, पाकिस्तान के पास इस बात के पुख्ता प्रमाण नहीं हैं कि जाधव को किस अपराध में दोषी पाया गया है और उसे कब और कहां से गिरफ्तार किया गया है?
ठोस सबूत के तौर पर सिर्फ जाधव के कबूलनामे का वीडियो था, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों की विद्वता पर तरस आता है कि उन्हें कानून से जुड़ी हुई इस साधारण सी बात की भी जानकारी नहीं थी कि दुनिया की कोई भी अदालत कबूलनामे को सबूत नहीं मानती। हालांकि, पाकिस्तान के वकील ख्वार कुरैशी ने पाकिस्तान द्वारा वियना संधि के उल्लंघन के आरोपों को यह कहते हुए खारिज किया कि जाधव राजनयिक नहीं आतंकवादी है।
लिहाजा, उस पर इस संधि के प्रावधान लागू नहीं होते। उनका यह भी तर्क है कि जाधव का मसला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है, लिहाजा उनके मामले में वियना संधि नहीं बल्कि पाकिस्तान के घरेलू कानूनों का पालन किया जाएगा। इस मामले में हेग अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। हालांकि, न्यायालय का रुख भारत के प्रति सकारात्मक दिखाई दिया। इसलिए उम्मीद की जाती है कि कुलभूषण जाधव को न्याय मिल पाएगा।

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