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न्याय के मंदिर का सराहनीय न्याय

हमारे देश के सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि वह न्याय का ऐसा मंदिर है जहां किसी के साथ भी भेद भाव नहीं होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत 9 मई को अभूतपूर्व फैसला सुनाया। उसने अपने ही हाईकोर्ट के जज, जस्टिस सी एस कर्णन को अदालत की अवमानना के लिए छह महीने की जेल की सजा सुनाई है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे एस खेहर ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि हम उन्हें जेल नहीं भेजेंगे तो यह एक धब्बा जरूर होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक जज को अवमानना से माफ कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की यह टिप्पणी दर्शाती है कि देश के इस सर्वोच्च न्याय मंदिर को अपनी गरिमा का कितना ख्याल रहता है। संविधान के तीन प्रमुख अंगों में संभवता न्यायपालिका की गरिमा को इसीलिए जनता सबसे ऊपर रखती है। इससे कार्यपालिका और विधायिका को भी सीख लेने की जरूरत है। विशेष रूप से विधायिका तो जरूर इससे शिक्षा ले जहां नेताओं में गंभीर आरोप लगते हैं और पार्टी उन्हें बचाने का पूरा प्रयास करती है। पानी जब सिर से ऊपर होने लगता है, तभी कार्रवाई की जाती है।सुप्रीम कोर्ट ने अभी चारदिन पहले भी (पांच मई 2017) निर्भया कांड में ऐसा ही फैसला सुनाया जिसे पूरे देश में सराहा गया था। निर्भया के हत्यारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे अपराधियों को जीने का कोई अधिकार नहीं है। अब कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस कर्णन को सजा सुनाकर सुप्रीम कोर्ट ने यही संदेश दिया है कि यह सचमुच न्याय का मंदिर है।
इस मामले की शुरूआत भी हंगामेदार हुई थी। उस समय जस्टिस कर्णन ही जनता के हीरो बन गये थे। अपने लोगों के बीच ही अपराधियों पर उंगली उठाना कहने में तो आसान लगता है लेकिन व्यावहारिक रूप से यह बहुत कठिन होता है। विधायिका के क्षेत्र में तो अक्सर जब कोई नेता पार्टी से निकाल दिया जाता है, तभी वह अपनी पार्टी के नेताओं पर गंभीर से गंभीर आरोप लगाने लगता है। मौजूदा समय में दिल्ली सरकार में यही हो रहा है। आम आदमी पार्टी के नेता कपिल मिश्र को जब पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निकाला गया तब उन्होंने मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर दो हजार करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप लगाया। सवाल उठता है कि यह रिश्वत एक-दो दिन पहले ही नहीं ली गयी क्योंकि कपिल मिश्र कहते हैं मेरे सामने ही यह लेनदेन हुआ था, तो उसी समय जनता के सामने कपिल मिश्र क्यों नहीं आए? इसी तरह के उदाहरण विधायिका में भरे हुए हैं। बहरहाल, यहां पर हम सिर्फ विधायिका और न्यायपालिका को साथ-साथ रखकर जस्टिस कर्णन की बात कहना चाहते हैं। जस्टिस कर्णन ने प्रधान मंत्री को पत्र लिखकर सर्वोच्च न्यायालय और हाईकोर्ट के कई जजों पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाये थे। जस्टिस कर्णन ने अपने पत्र के साथ उन जजों की एक सूची भी दी थी, जिनके बारे में उनका दावा था कि ये भ्रष्टाचार कर रहे हैं। जस्टिस कर्णन के इस कदम का जनता ने इसी लिए स्वागत किया था कि चलो कोई जज इतनी हिम्मत तो दिखा रहा है। भ्रष्टाचार को लेकर अब जनता को यह यकीन हो गया है कि दूध का धुला कोई नहीं रह गया। जनता ने एक तरह से उस व्यवस्था में रहने को अपना भाग्य मान लिया है जहा दुकानदार कम सामान देकर ज्यादा पैसे लेगा, सरकारी दफ्तरों से कोई काम करवाना है तो वहां कुछ न कुछ पैसे खर्च करने ही पड़ेंगे। बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना है तो निजी स्कूलों के प्रबंधकों का शोषण सहन करना ही पड़ेगा आदि-आदि।
इसीलिए देश की जनता ने तब जस्टिस कर्णन की जय जय कार की थी और यह उम्मीद जतायी कि न्याय के मंदिर में भी यदि भ्रष्टाचारी घुस गये हैं तो उन्हें निकाल बाहर किया जाएगा। दूसरी तरफ जस्टिस कर्णन के विरोध में न्याय के मंदिर से ही कई लोग खड़े हो गये। जस्टिस कर्णन का विवादों से पुराना नाता है। इससे पहले भी वह तब विवादों में आए थे जब मद्रास हाईकोर्ट से कलकत्ता हाईकोर्ट आने पर उन्होंने अपने ही तबादले पर स्थगनादेश जारी कर दिया था? इतना ही नहीं जस्टिस कर्णन ने मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को नोटिस भी जारी कर दी थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा था और मामला जब गंभीर होन लगा तो राष्ट्रपति के निर्देश पर उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट में कार्यभार संभाला था। उस समय मामला कितना गंभीर हो गया था, इसकी बानगी सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही से भी मिलती है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दिमागी हालत की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड बनाया लेकिन जस्टिस कर्णन जांच कराने को तैयार नहीं हुए। इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने के बारे में चिट्ठियां लिखने के मामले को संज्ञान में लिया। यह इसलिए भी जरूरी था क्योंकि आरोपों में घिरे हुए जज जनता को फैसला दे रहे थे और यह न्याय व्यवस्था का अपमान था। सुप्रीम कोर्ट ने उस समय जस्टिस कर्णन से यही कहा था कि वे चिट्ठियां वापस लेकर बिना शर्त माफी मांग लें। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन को कई बार नोटिस भेजवाए। अदालत के सामान्य मामलों में भी यही प्रक्रिया अपनायी जाती है। जस्टिस कर्णन के न्याधिक और प्रशासनिक अधिकार निलंबित कर दिये गये थे, इसलिए वह एक बार इस लिए अदालत जरूर गये कि उनके न्यायिक और प्रशासनिक अधिकार बहाल कर दिये जाएं लेकिन सुप्रीम कोर्ट की नसीहत पर न तो ध्यान दिया और न उसके बुलाने पर अदालत पहुंचे। पेशी पर न आने को सर्वोच्च अदालत ने जानबूझकर अवमानना का दोषी माना।
भारत के न्यायिक इतिहास में यह भी पहली बार हुआ था कि कोई मौजूदा जज सुप्रीम कोर्ट के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश हुआ हो, वो भी अपने प्रशासनिक और न्यायिक अधिकार बहाल करवाने के लिए। बहरहाल जस्टिस कर्णन ने उसी समय कह दिया था कि अब वे दोबारा कोर्ट में नहीं आएंगे। इस प्रकार मामले के दो प्रमुख पक्ष सामने आए हैं। अदालत की अवमानना करने पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जज को भी सजा सुनादी, यह उसकी निष्पक्ष न्याय प्रणाली का नमूना है। हाईकोर्ट जज के अधिकार क्या हैं, यह बताने की विस्तार से जरूरत नहीं है। हाईकोर्ट के जज की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। उन्हें संसद में महाभियोग लाकर ही हटाया जा सकता है और महाअभियोग के प्रस्ताव को पारित कराने के लिए संसद में दो तिहाई प्रतिनिधि इसके लिए तैयार हों। इस प्रकार हाईकोर्ट के जज को हटाना भी आसान नहीं हैं लेकिन यदि वह स्वयं अपने ही मंदिर के नियम कानून को तोड़ने लगे तो उसे सजा भी मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह संदेश तो देश और दुनिया को मिल ही गया है कि कोई भी इंसान कितना ही प्रभावशाली ताकतवर क्यों न हो, वह देश के कानून से ऊपर नहीं होता। दूसरी तरफ यह सवाल भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता जो जस्टिस कर्णन ने उठाया है। न्यायपालिका जैसी सर्वोच्च संस्था में ऐसे सवाल क्यों उठते हैं? इन पर सुप्रीम कोर्ट को जनता के सामने सच लाना चाहिए। जस्टिस कर्णन ने जो आरोप लगाये थे, उनकी सच्चाई भी देश जानना चाहता है। संविधान के तीन स्तम्भो, विशेष रूप से विधायिका के लिए सुप्रीमकोर्ट का यह फैसला आईना दिखा रहा है। -अशोक त्रिपाठी

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