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रमजान का महीना इन दुनियावी चीजों पर नियंत्रण रखने की साधना और तमाम इंसानों के दुख-दर्द और भूख-प्यास को समझने का महीना है: नसीम नाॅज

पांवटा साहिब। कल से इस्लामिक कैलेंडर के सबसे पवित्र महीने माह-ए-रमजान की शुरुआत हो रही है। ये महीना कुरान शरीफ के दुनिया में नाजिल होने का महीना है। रमजान नेकियों, आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण का एक अवसर और समूची मानव जाति को प्रेम, करुणा, भाईचारे और इंसानियत का संदेश है जो नफरत और हिंसा से भरे इस दौर में पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो गया है।
भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के मण्डल अध्यक्ष नसीम नाॅज ने पवित्र महीने माह-ए-रमजान के बारे जानकारी देते हुए बताया कि मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम के मुताबिक ”रोजा सभी बन्दों को जब्ते नफ्स अर्थात आत्मनियंत्रण की तरबियत देता है और परहेजगारी पैदा करता है।“ हम सबके ही अंदर जिस्म और रूह दोनों हैं। आम दिनों में हमारा जीवन भूख, प्यास और दीगर जिस्मानी ख्वाहिशों के गिर्द घूमता है। रमजान का महीना इन दुनियावी चीजों पर नियंत्रण रखने की साधना और तमाम इंसानों के दुख-दर्द और भूख-प्यास को समझने का महीना है। जिस असल चीज रूह को हम साल भर भुलाए रहते हैं, रमजान उसी को जगाने का आयोजन है।

रोजे में उपवास और जल-त्याग का मकसद यह है कि आप दुनिया के भूखे और प्यासे लोगों का दर्द महसूस कर सकें। परहेज और आत्मसंयम का मकसद यह है कि अपनी जरूरतों में कटौती कर आप अभावग्रस्त लोगों की कुछ जरूरतें पूरी कर सकें। यह महीना वस्तुतः व्यक्ति को उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों का अहसास दिलाने का अपूर्व आयोजन है। यह हमें आत्मावलोकन का मौका भी देता है। अगर हम अपनी कमियों को पहचान कर उन्हें दूर करने की कोशिश करें तो दुनिया से बुराई खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगी। रहमत और बरकत के नजरिए से रमजान के महीने को तीन हिस्सों या अशरा में बांटा गया है। महीने के पहले दस दिन श्रहमतश् के हैं जिसमें अल्लाह अपने रोजेदारों पर रहमतों की बारिश करता है। दूसरा अशरा श्बरकतश् का है जिसमें खुदा रोजेदारों पर बरकत नाजिल करता है। तीसरा अशरा ‘मगफिरत’ का है जब अल्लाह अपने बंदों को तमाम गुनाहों से पाक कर देता है।

समस्त मित्रों को रमजान के इस पवित्र माह की हार्दिक शुभकामनाएं।

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