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बच्चे और इंटरनेट

बच्चों! यह सच है कि सोशल मीडिया बहुत अच्छा है, ढेर सारी जानकारियां देता है लेकिन इससे सावधान रहने की भी जरूरत है। इससे अच्छी जानकारी प्राप्त करें, अच्छे खेल खेलें लेकिन पश्चिम बंगाल के उस बच्चे की तरह कोई गलती न करें जिसने वहां जबर्दस्त साम्प्रदायिक हिंसा पैदा कर दी। एक विशेष सम्प्रदाय पर किये गये आपत्तिजनक कमेन्ट को एक किशोर ने अनजाने में ही आगे बढ़ा दिया। वह नहीं जानता था कि इसकी आग इतनी भयानक हो जाएगी इसलिए सवाल उठता है कि बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल को क्या सीमित कर देना चाहिए? इंटरनेट इस्तेमाल के सीमित कर देने से उन्हें सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव से नहीं बचाया जा सकता। ब्रिटेन के एजूकेशन पांॅलिसी इंस्टीट्यूट के एक नए शोध में यह पाया गया है कि इसका प्रभाव सीधे-सीधे बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। विकसित देशों में इंटरनेट का सबसे ज्यादा इस्तेमाल इंग्लैण्ड के किशोर ही करते हैं।
भारत के लिए भी खबर अच्छी नहीं है। ब्रिटेन के अध्ययन में कहा गया है कि भारतीय बच्चे इंटरनेट पर गंदी वेबसाइटों को ज्यादा खोजते हैं। यह खबर कम्प्यूटर साफ्टवेयर बनाने वाली कम्पनी मैकफी ने दी है और इससे भारत के कितने ही अभिभावकों की नीदं उड़ गयी है। मैकफी का मानना है कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के मुकाबले आपत्तिजनक वेबसाइटों पर भारत के बच्चे ज्यादा पहुंच रहे हैं। अब मोबाइल हर बच्चे के हाथ में देखा जाता है और अभिभावक उन पर कितनी नजर रखेंगे। शोध में यह पाया गया कि लगभग 36 फीसद अभिभावकों का कहना है कि वे इस मामले में काफी सतर्क हैं और बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए साफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हैं। मैकाफी के सर्वे में लगभग 50 फीसदी माता-पिता ने यह स्वीकार किया कि उनके बच्चे अनुचित वेबसाइट पर जाते हैं। इस मामले में जगह-जगह खुले साइबर कैफे भी बच्चों को गुमराह करने में मदद कर रहे हैं। आपत्तिजनक वेबसाइटों पर जाने के मामले में भारतीय बच्चे अन्य 13 देशों से आगे हैं। शोध में पाया गया कि आस्ट्रेलिया के 26 फीसद, ब्राजील के 45 फीसद, फ्रांस के 41 फीसद अमेरिका के 37 फीसद और ब्रिटेन के 23 फीसद बच्चे अनुचित वेबसाइटों को देखते हैं।
इन आपत्तिजनक वेबसाइटों को देखने वाले बच्चे मानसिक रूप से बीमार हो जाते हैं। इंग्लैण्ड के चाइल्ड कमिश्नर ने आपत्तिजनक वेबसाइटों का बच्चों पर प्रभाव के ऊपर एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एक बड़ी तदाद में बच्चे इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री देख रहे हैं। इस बारे में यह भी कहा गया है कि अन्य चीजों को तलाशते समय आपत्तिजनक साइट बच्चों के सामने आ जाती है। इस तरह की जानकारी देते हुए 11 साल के एक बच्चे ने बताया कि कुछ हफ्ते पूर्व उसने एक स्मार्ट फोन पर बेहद अश्लील वीडियो देखा जिसकी याद उसके दिमाग से अब तक नहीं मिट पायी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आज जब अत्यधिक हिंसक और दूसरे को कष्ट देने वाले दृश्य क्लिक करके देखे जा सकते हैं तो स्कूली शिक्षा के सामने निश्चित रूप से एक बड़ी चुनौती है।
इंटरनेट पर ढेर सारी अच्छी-अच्छी किताबें मिलती हैं। किताबें सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। इन्हें बाजार से भी खरीदा जा सकता है। अभिभावकों का भी यह कर्तव्य है कि बच्चों को किताबें लाकर दें और उनकी पसंद का भी ध्यान रखें। बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करें। मोबाइल देखना बच्चों की आदत में शामिल हो गया है तो उस पर अच्छी किताबें, अच्छे बिचार देखें। इससे उनका मानसिक विकास होगा। इन पंक्तियों को लिखने का हमारा भी यही आशय है कि यदि गंदी, आपत्तिजनक, डरावनी वेबसाइट आप देख रहे हैं तो उन्हें देखना बंद कर दें। इंटरनेट को अपना ऐसा दोस्त बनाएं जो बुराइयों से दूर कर आपको अच्छाई की राह दिखाए।

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